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संघ हुआ बेनकाब – नही मिला शहीद राजगुरु के संघी होने का कोई सबूत

जैसा कि सारा देश जानता है कि संघ का आजादी की लड़ाई मे दूर दूर तक कोई लेना देना नही था बल्कि संघ अंग्रेजों से अपनी जान बचाने के लिए माफी मांगते फिरते थे और आजादी की लड़ाई लड़ने वालो के खिलाफ गवाही करते थे अंग्रेजों के लिये मुखबिरी का काम करते थे जो इतिहास मे दर्ज़ है।

राजगुरू के परिजनो ने संघ को बेनकाब करते हुए कहा कि राजगुरू का संघ से दूर तक कोई वास्ता नही था देश के बिगड़ते माहौल से परेशान संघ आजादी की लड़ाई लड़ने वालो को अपना बताने का फर्जी प्रयास कर रहे है जिसमे कोई सच्चाई नहीं है ।

राजगुरु के परिजनों का कहना है कि वह समस्त देश के क्रांतिकारी थे और उनका नाम किसी ख़ास संगठन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.

हाल में आई एक किताब में स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवक के रूप में दिखाए जाने पर रोष प्रकट करते हुए उनके परिजनों ने कहा है कि राजगुरु के संघ से संबद्ध होने का कोई सबूत नहीं है.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व राष्ट्रीय प्रचारक एवं पत्रकार नरेंद्र सहगल द्वारा लिखी गई किताब में दावा किया गया है कि राजगुरु संघ के ‘स्वयंसेवक’ थे.

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजगुरु को शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह और क्रांतिकारी सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी दे दी गई थी. साल 1928 में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या के आरोप में उन्हें यह सज़ा दी गई थी.

क्रांतिकारी राजगुरु के भाई के पौत्रों सत्यशील और हर्षवर्धन राजगुरु ने बीते सोमवार को पुणे में कहा, ‘इस बारे में कोई सबूत नहीं है कि राजगुरु आरएसएस के स्वयंसेवक थे और न ही हमारे दादा ने कभी हमें इस बारे में बताया.’

उन्होंने एक मराठी समाचार चैनल से कहा, ‘हालांकि यह सही है कि नागपुर में उनके (राजगुरु) संक्षिप्त प्रवास के दौरान संघ के एक स्वयंसेवक ने प्रबंध किए थे.’

सत्यशील और हर्षवर्धन राजगुरु ने कहा, ‘राजगुरु समस्त देश के क्रांतिकारी थे और उनका नाम किसी ख़ास संगठन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.’

वरिष्ठ आरएसएस नेता एमजी वैद्य ने इस बात का खंडन किया है. उन्होंने कहा कि हो सकता है कि संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में राजगुरु के प्रवास के लिए ‘गोपनीय प्रबंध’ कराए हों.

यह पूछे जाने पर कि क्या राजगुरु ने नागपुर में आरएसएस की शाखा मोहिते बाग का दौरा किया था, वैद्य ने कहा, ‘आप पूछ रहे हैं कि क्या राजगुरु शाखा आए थे. हो सकता है, वह आए हों. क्या डॉ. हेडगेवार ने उनके लिए कुछ इंतज़ाम किए थे? हो सकता है उन्होंने किया हो.’

उन्होंने नागपुर में कहा, ‘जब अरुणा आसफ़ अली (स्वतंत्रता संग्राम के दौरान) भूमिगत थीं तो वह दिल्ली के आरएसएस पदाधिकारी हंसराज गुप्ता के घर ठहरी थीं.’

वैद्य ने कहा, ‘यदि (राजगुरु) आए होंगे तो संभावना है कि डॉ. हेडगेवार ने उनके प्रवास के लिए गोपनीय प्रबंध किए हों. यह संभव है क्योंकि डॉ. हेडगेवार एक क्रांतिकारी थे और क्रांतिकारियों से उनके संबंध थे. उनकी आत्मकथा में भी इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया है.’

यह पूछे जाने पर कि क्या कभी संघ की बौद्धिक चर्चाओं में राजगुरु के बारे में चर्चा हुई, आरएसएस के पूर्व बौद्धिक प्रमुख वैद्य ने कहा, ‘कम से कम मैंने इस बारे में नहीं सुना है.’

आरएसएस के पूर्व प्रचारक नरेंद्र सहगल ने अपनी किताब ‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ में दावा किया है राजगुरु न केवल संघ के स्वयंसेवक थे बल्कि नागपुर में संघ के मुख्यालय मोहिते बाग के स्वयंसेवक थे.

नागपुर में बीते मार्च के महीने में अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के दौरान इस किताब की प्रतियां बांटी गई थीं.

हिदुसतान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, किताब के एक हिस्से जिसका शीर्षक ‘स्वयंसेवक स्वतंत्रता सेनानी’ में सहगल ने लिखा है कि ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेपी सांडर्स की हत्या के बाद राजगुरु नागपुर में संघ मुख्यालय का दौरा किया था.

वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय के ज़ख़्मी होने और बाद में उनकी मौत का बदला लेने के लिए सांडर्स की हत्या की गई थी.

सहगल के अनुसार, नागपुर में राजगुरु संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार से मिले थे, जिन्होंने उनके लिए एक सुरक्षित ठिकाने का इंतज़ाम किया था और पुणे में उनके अपने घर नहीं जाने की सलाह दी थी.

सहगल ने लिखा है, ‘उनके बलिदान (राजगुरु और दूसरे लोगों को फांसी दिए जाने की ख़बर) के बारे में सुनकर गुरुजी (हेडगेवार) दुखी थे, लेकिन हैरान नहीं. उन्होंने अपने सहयोगियों से कहा था कि उनका बलिदान बेकार नहीं जाएगा.’

इस दावे की सच्चाई के बारे में पूछ जाने पर सहगल ने कहा था, ‘यह तथ्य संघ के कई प्रकाशनों में अभिलिखित है. इस बात का ज़िक्र वर्ष 1960 सबसे पहले नारायण हरि ने अपनी किताब में किया था.’

हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में इतिहासकार आदित्य मुखर्जी ने कहा था, ‘बीआर आंबेडकर, स्वामी विवेकानंद और बाल गंगाधर तिलक की तरह राजगुरु को अपना बताना संघ का एक हास्यापद प्रयास है.’

भगत सिंह और उनके साहित्यों के दस्तावेज़ नामक किताब का संपादन करने वाले जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर चमन लाल ने भी सहगल के इस दावे को ख़ारिज किया था.

उन्होंने कहा था, ‘इससे पहले संघ की ओर से भगत सिंह को अपना सहयोगी बताने की कोशिश की गई थी. इस बात का कोई सबूत नहीं है कि भगत सिंह या राजगुरु संघ में शामिल थे. उनके सहयोगियों की ओर से लिखी गई आत्मकथाओं में भी इस तरह के दावे का ज़िक्र नहीं है.

साभार द वायर

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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