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रोहिंगया ने 1913 में तुर्की को इमदादी फंड भेजा था आज तुर्की 70 मिलियन डॉलर की मदद भेज उसी क़र्ज़ को चुका रहा है

रोहिंगया और तुर्की के दरमियान एक पुराना नाता है जिसका ख़ुलासा ख़िलाफत उषमानिया के एक दस्तावेज़ से हुआ. तुर्की के उप प्रधान मंत्री, फक्री अशिक ने एक दस्तावेज प्रकाशित किया है, जिसमें रोहंग्या मुस्लिम और तुर्क के बीच एकता की शुरुआत प्रथम विश्व युद्ध के साथ शुरू होती है जब तुर्क सरकार को भौतिक और भावनात्मक समर्थन दिया गया था. आज तुर्की मदद के लिए आगे आया है. म्यांमार में रोहिंगया मुसलमानों के नर संहार के बाद बांग्लादेश में शरण लिए रोहिंगया भूख और बीमारी से तड़प कर मर रहे है. तुर्की ने उनकी मदद के लिए ७० मिलियन डॉलर भेजे है. तुर्की राष्ट्रपति तईप एर्दोगान ने कहा है की ये मदद पर्याप्त नहीं है हम और भी मदद भेजेगें.

उषमानी दस्तावेज़ के मुताबिक़ रोहिंगया मुसलमानों ने बलक़ान की जंग में शहीद और ज़ख़मियों के लिये 1913 में तुर्की को एक इमदादी फंड़ भेजवाया था साथ ही रंगुन से एक ख़त भी भेजा गया था. जिसमें वज़िर आज़म शहज़ादा हलमी पाशा को ज़ंग में जीत की बधाई भी दी गई थी. रंगुन से इमदादी फंड भेजने वाले अहमद मोला दाऊद ने पत्र में कहा था, “मैं इस मौके पर आप को बधाई देता हूं, अापके कैबिनेट के सदस्यों और हमारे भाइयों बहनों जो नोपेल और अन्य खोए हुए क्षेत्रों पर इस अनूठी और शानदार जीत पर बधाई देता हूं।” 

उन्होंने यह भी कहा कि रोहिंगिया के लोगों ने अपने मुस्लिम भाइयों की फतह के लिये मस्जिदों में दुआएं की थी और समारोह का जश्न मनाया था.

ट्विटर पर अपने संदेश में उप प्रधान मंत्री ने कहा, “इस ख़त से रोहिंगया मुसलमानों और तुर्कों में गहरी एकता का पता चलता है. हमारा देश शुक्र गुज़ार है उन रोहिंगया मुसलमानों का जिनहोंने जंग के वक़्त तुर्की की मदद की और ये हम पर एक क़र्ज जैसा है आज हमें मौक़ा मिला है इस क़र्ज़ को चुकाने का और हम अपना फर्ज़ अदा करने से पिछे नही हटेंगें.

गौरतलब है के रोहिंगया मुसलमानों पर ज़ुल्म के ख़िलाफ तुर्की ने ही सबसे पहले आवाज़ उठाई और आगे बढ कर उनकी मदद भा कर रहा है.

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