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जब बीजेपी सरकार खुद ही खटिया पर लेटी है, तो अपराधी खटिया खड़ी कर ही देगे

कहीं दंगा, कहीं रेप, कहीं डकैती, चोरी, ठगी से अखबार भरे हुए हैं। कभी सोचा है ये सब अपराधी आये कहाँ से ? अब तो पेशेवर अपराधी गिरोहों के जमाने लद चुके हैं। फिर भी रोज कोई न कोई अपराध अपने आस पास दिख ही जाता है। असल मे ये हमारे देश का कुंठित युवा है।

बेरोजगारी ओर आर्थिक, सामाजिक कारणों से देश का युवा आत्महत्या, नशे औऱ अपराध की तरफ लगातार उन्मुक्त हो रहा है। बानगी देखिये, अभी पौने चार साल बाद रेलवे ने 1 लाख 10 हजार भर्तियां निकाली तो आवेदकों की संख्या 2 करोड़ पार कर गयी। पिछले वर्ष दिसम्बर में एमपी में मात्र 50 दिन के ठेके पर पालिकाओं में सफाईकर्मी की अर्जियां 3 लाख से ऊपर आयी थीं। यूपी में चपरासी के 368 पदों के लिए 23 लाख आवेदन आये। इन सभी जगहों में कॉमन बात ये है कि आवेदन करने वाले ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट, एमबीए, बीटेक जैसे उच्च शिक्षित युवा हैं।

कारण स्पष्ट है। हमारी शिक्षा नीति युवाओं को डिग्री देती है न कि रोजगार। उच्च शिक्षित युवा स्वरोजगार करने का आत्मविश्वास भी खो चुका है। इसके अलावा सामाजिक अकेलापन उनका संबल छीन रहा है।

यही कुंठित बेरोजगारी युवाओं जीवन के यथार्थ से पलायन कर नशे, पोर्न, इंटरनेट का आदी बना रहे हैं। ये कुंठा अपराध के रूप में भी बाहर आती है। मामूली कहासुनी पर, चलते में धक्का लगने पर या गाड़ी की साइड लग जाने का विवाद हत्या तक पहुंच जाता है। आसानी से उपलब्ध न होने की दशा में बच्चियों से बलात्कार, लड़कियों का कत्ल अब मामूली बात है। स्त्रियों बुजुर्गों से क्रूरता तरुणाई के दिशाहीन हो जाने के प्रमाण हैं।

अपने जीवन मे आ चुके शून्य को भरने के लिए आज का युवा सोशल मीडिया राहत तलाश कर रहा है। कई नौजवान तो 8 घण्टे तक ऑनलाइन रहते हैं। सनद रहे इंटरनेट का अत्यधिक प्रयोग एकाकीपन और सनकीपन पैदा करता है। चिड़चिड़ापन और उन्माद इसका प्रमुख लक्षण है।

इस एकाकीपन और उन्माद की परिणीति मॉब लिंचिंग, धार्मिक दंगो में भी सामने आती है जहाँ हमारे बेरोजगार नौजवान साम्प्रदायिक तत्वों के इस्तेमाल के लिए नरम चारा हैं। इन सबके अलावा युवाओं में बढ़ती हुई आत्महत्या की प्रवत्ति भी बहुत गम्भीर विषय है। आने वाले खतरे को सूंघ लीजिये। अपनी अगली पीढ़ी को विध्वंस की तरफ धकेलने के बजाय रचनात्मक कार्यो के प्रति सजग करने की जिम्मेदारी हम सबकी है – राजेश यादव

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