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उप्र मे अखिलेश और मायावती ने बिगाङा बीजेपी का खेल, बीजेपी का होगा सूपङा साफ।

अखिलेश यादव के बंगला खाली करने के एक हफ्ते बाद मीडिया को बुलाकर बंगले की वीडियोग्राफी न्यूज चैनलों पर दिखाना साफ साफ साजिश की तरफ इशारा कर रहा है। अब महामहिम राम नाइक का मौन व्रत भी टूटा है। वही मौन व्रत जो वो गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से दर्जनों बच्चों की मौत पर, प्रदेश में बिगड़ी कानून व्यवस्था पर, 17 पुलिस कर्मियों की हत्या और आये दिन उन पर सत्ता के नजदीकियों की हत्या पर, डकैती, रेप, गो तस्करी की बढ़ती घटनाओं पर और बीजेपी विधायक कुलदीप सेंगर जैसे अन्य सत्ताधारी विधायको के बलात्कारी होने के खुलासे पर नही टूटा था।

असल मे संघ जिससे डरता है सबसे पहले उस व्यक्ति का चरित्र हनन करता है, नाम बिगाड़ देता है। उसके पीछे पड़ जाता है। चुटकुले, कहावतें गढ़कर आम आदमी तक अपनी बात पहुँचा देने का हुनर उसे मालूम है। इस काम मे उसका सहयोग मीडिया हमेशा से करता रहा है। राहुल गाँधी जी को पप्पू की इमेज में ढालने के लिए अरबों रुपये खर्च करने के बाद अब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव निशाने पर हैं। आगामी लोकसभा चुनाव 2019 में अखिलेश यादव विपक्षी एकता की धुरी हैं। इसलिए इनकी ये हरकत अकारण नही हैं।

यदि अखिलेश यादव पिछले लोकसभा चुनाव में शून्य पर आउट हुई बसपा को संजीवनी देकर जीवित न करते तो विपक्षी एकता परवान नही चढ़ती। आज कांग्रेस मायावती जी के आगे बिछी जा रही है तो इसकी एक मात्र वजह यूपी की 3 सीटों पर सपा बसपा गठबन्धन का सफल प्रयोग है। जिसकी पहल दोनों पार्टियों की पुरानी कटुता भुलाकर अखिलेश जी ने की थी। अखिलेश ने बसपा के शून्य को अंक के बाद लगाकर उसकी शक्ति को अचानक बहुत बढ़ा दिया है। एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में बसपा से कांग्रेस का गठबन्धन बीजेपी का सूपड़ा साफ कर देगा। देख लीजियेगा। अखिलेश ने गठबन्धन धर्म निभाते हुए बसपा को अधिक सीटे देने की पेशकश कर गठबन्धन में आने वाली अड़चनों की चर्चाओं पर भी विराम लगा दिया है और ये सिद्ध कर दिया कि वो केंद्र में गैर भाजपा सरकार बनाने के लिए विपक्षी गोलबंदी के प्रति पूरी तरह से गम्भीर हैं।

प्रदेश की 2 छोटे दलों पीस पार्टी और निषाद पार्टी को अपने खेमे में लाने के बाद बसपा का भरोसा जीतना आवश्यक था। इस गठबंधन के लिए अखिलेश जी ने राज्यसभा में बसपा उम्मीदवार के पक्ष में वोटिंग करवाई, फिर विधान परिषद में सपा के बजाय बसपा उमीदवार को लड़वा कर देश की सेक्युलर जमात को आशश्वत किया कि मेरी तरफ देश की एकता अखंडता और संवैधानिक मूल्यों को बचाने की कोशिश में कोई कसर नही रखी जायेगी।

मायावती जी को भरोसे में लेकर उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ठीक-ठाक जनाधार रखने वाले चौधरी अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल को साथ लेने का फैसला किया। कैराना और नूरपुर, दोनों सीटों पर पिछले चुनाव में आरएलडी बुरी तरह हारी थी। चौधरी अजीत सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी जी के राजनैतक अस्तित्व पर संकट था। उन्होंने कैराना लोकसभा सीट आरएलडी को सौंपने का फैसला किया। अखिलेश का ये दांव भी राजनीतिक पंडितों की कल्पना से परे था। सभी का अनुमान था कि आरएलडी को साधने के लिए अखिलेश यादव नूरपुर विधानसभा की सीट छोड़ेंगे, लेकिन उन्होंने कैराना लोकसभा सीट छोड़ी। अपनी पार्टी की सदस्य तबस्सुम हसन को रालोद के चुनाव चिन्ह पर जिता कर प्रदेश के मुसलमानो का दिल भी जीत लिया।मुजफ्फरनगर दंगों और कैराना से हिंदुओं के कथित पलायन के बाद जाट और मुस्लिमों के बीच खाई गहरी हुई थी, जिसका खामियाजा आरएलडी को भुगतना पड़ा था। अखिलेश जी का पश्चिम यूपी मे जाट औऱ मुस्लिम एकता का ये प्रयोग भी सफल हुआ।

पीस पार्टी, निषाद पार्टी औऱ रालोद को साधकर अखिलेश ने अभी से यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के लक्ष्य को भेदने की नींव खड़ी कर ली है। इसपर अभी से कुछ लिखना बोलना जल्दबाजी होगी।

नेताजी मुलायम सिंह जी के नेतृत्व मे परिवार भी एक जुट है। इसका सबूत अभी वृंदावन यात्रा में अखिलेश जी के साथ उनकी माता साधना जी को देख मिल गया। चाचा शिवपाल जी भी भतीजे के साथ मजबूती से खड़े हैं। सब आसार अच्छे दिख रहे हैं। फिलहाल अखिलेश एमपी विधानसभा चुनावों की अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में व्यस्त हैं।

कांग्रेस ने भी दिल बड़ा कर लिया है। लोकसभा चुनाव के लिए 300 – 320 सीटें अपने पास रख बाकी सहयोगियों के लिए छोड़ने को तैयार है। बीजेपी के आंतरिक सर्वे में उसे 130 सीटें मिलने की बात सामने आई है। विपक्ष की गोलबंदी तगड़ी हुई और सीटों पर ज्यादा पेंच नही फंसे तो इनकी हालत और भी खराब होने वाली है। इसलिए इन डरे हुए लोगों को टोंटी, मारबल चिल्लाने दीजिये। इससे कुछ होने वाला नही है। जनता से जुड़े मुद्दों पर फोकस बनाये रहिये – सत्यार्थ

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