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रवीश कुमार

NPA की भरपाई के लिए बैंक अपने कर्मचारी अधिकारी से कहते हैं कि जनता से तरह तरह की धोखाधड़ी करो

बैंकों के एनपीए को लेकर एक नया चक्र समझ आया। राजनीतिक प्रभाव से कुछ लोग लाखों करोड़ का कर्ज़ लेते हैं, कर्ज़ वापस नहीं करते हैं। यह कर्ज़ उल्टा बैंकों पर कर्ज़ बन जाता है जिसे हम एन पी ए कहते हैं। बैंक जनता के पैसे को ही कर्ज़ पर देकर कमाई करते हैं। जितना एन पी ए हुए उतना वे जनता के कर्ज़दार हुए। इस एन पी ए की भरपाई के लिए बैंक अपने कर्मचारी अधिकारी से कहते हैं कि जनता से तरह तरह की धोखाधड़ी करो, यही नहीं बैंक उन कर्मचारी अधिकारियों के साथ भी धोखाधड़ी करते हैं। एन पी ए के कारण बैंकरों की सैलरी नहीं बढ़ती है । लूट की यह राशि चंद हाथों में सिमट रही है और लाखों लोग सिसक रहे हैं। 26,000 खाते हैं मगर ब्रांच में दो लोग काम कर रहे हैं। लाखों बेरोज़गार नौजवान इस हिन्दू मुस्लिम और राष्ट्रवादी माहौल के नाम पर नौकरी पाने से वंचित रह गए और जो नौकरी मे हैं वो ग़ुलाम बन गए। बैंकिंग सेक्टर की नौकरियां बहुत कम हो चुकी हैं।

उम्मीद है आपको यह फोटो समझ आ गया होगा। एक नही बल्कि सैंकड़ों बैंकरों ने लिखा है कि जब उनके पास कोई किसान कर्ज़ के लिए आता है तो उन्हें मजबूर किया जाता है कि वे किसान की ग़रीबी से थोड़ा और पैसा, जिसे आप ख़ून भी कह सकते हैं, ख़ींच लें। ऊपर के अधिकारी हर घंटे फोन करते हैं कि अभी कितना बीमा बेचा। गाली देते हैं कि नकारे हो, अभी तक एक भी बीमा नहीं बेचा, तुम्हारा ट्रांसफर कर देंगे।

बैंकर सरकार की बनाई हुई बीमा पालिसी तो बेचते ही हैं, प्राइवेट कंपनियों की पॉलिसी भी बेचने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। जबकि बैंक में बीमा बेचने या बाद की सर्विस देने का कोई ढांचा नहीं है। अगर यही काम बीमा कंपनियां खुद से करती तो लाखों लोगों को काम मिलता। मगर जनता के पैसे सैलरी लेने वाले बैंकर प्राइवेट बीमा कंपनियों की पालिसी बेच रहे हैं।

इसका गेम समझिए। आपकी जेब से ज़बरन प्रीमियम लेकर बीमा पालिसी बिकती है। इससे ऊपर वालों को मोटा कमीशन मिलता है। किसी के इशारे पर ही तो ये गेम होता होगा न। कमीशन का पैसा निकल कर कहां जाता होगा। कमीशन में भी कमीशन होता है। यही वो आवारा पैसे हैं जो चुनाव के समय नेता जी के चेहरे पर चमकते हैं और स्लोगन लिखने वालों की मौज होती है। इस सिस्टम में पब्लिक भी पीस रही है और बैंकर भी। मगर दस पांच लोगों का गिरोह ऐश कर रहा है। सारा ध्यान बीमा पर जाने के कारण भी बैंकों की कोर कमाई कम हुई है। प्राइवेट बीमा कंपनियां बैंक के भीतर दखल देने लगी हैं।आज एक बैंकर कम से कम सात आठ प्रकार के सरकारी और प्राइवेट बीमा बेच रहा है।

एक बैंकर ने लिखा है कि किसान पचास हज़ार का कृषि लोन मांगने आया। हमने कहा कि एक लाख का लोन ले लो और साथ में पचास हज़ार का जीवन बीमा भी। किसान कह रहा है कि उसे एक लाख का कर्ज़ नहीं चाहिए और वह न चुका सकता है फिर भी बैंकर उसे मजबूर करता है क्योंकि पचास हज़ार का जीवन बीमा नहीं बेचेगा तो वह घर नहीं जा सकेगा। अगले दिन बैंक के बड़े अधिकारी उसे फोन कर मां बहन की गाली देंगे। भरी मीटिंग में अपमानित करेंगे। बैंकर अपना ख़ून बचाने के लिए किसानों का ख़ून चूसता है।

नतीजा दोनों का ही ख़ून चूसा जा रहा है। बैंक और ग्राहक के बीच शोषण का चक्र बन चुका है। किसान अपना कर्ज़ नहीं चुका पाता है क्योंकि वह तो पहले ही कह रहा था कि उसे एक लाख का लोन नहीं चाहिए। 50,000 का बीमा नहीं चाहिए। जिसका प्रीमियम भी उसे देना है। बैंकर ने कहा कि कई बार किसान उसका प्रीमियम लोने पर दिए जाने वाले ब्याज़ से ज़्यादा होता है। यही नहीं फसल बीमा के नाम पर हर साल किसान क्रेडिट कार्ड से बीमा राशि निकाल ली जाती है। किसान को पता तक नहीं होता है। बड़ी संख्या में भोले किसानों के साथ यह धोखा हो रहा है। उनकी जानकारी के बग़ैर फसल बीमा का प्रीमियम काट लिया जा रहा है।

आपको बता दूं कि फसल बीमा प्राइवेट कंपनियां भी करती हैं। अब आप बताइये, किसके इशारे पर, किसके हित के लिए प्राइवेट बीमा कंपनियों के लिए प्रीमियम किसानों के खाते से काटा जा रहा है। क्या आपको यह सूदखोरी से भी भयंकर और क्रूर व्यवस्था नहीं लगती है ? आप आज न कल इस हिन्दू मुस्लिम फ्रेमवर्क से निकल कर देखेंगे कि यह हुआ और जब हुआ तब चुप रहे।

किसानों की जानकारी के बग़ैर या उनकी कम जानकारी का लाभ उठाकर बीमा बेचने का यह धंधा उस भरोसे को तोड़ रहा है जिस पर बैंक कायम रहता है। क्या कोई ऐसी व्यवस्था है जो ईमानदारी से इन तथ्यों को बाहर ला सके कि कितने किसानों का फसल बीमा उनकी जानकारी के बग़ैर हुआ। धोखे से दस्तख़त कराने के बाद हुआ। फसल बीमा में सरकारी बीमा कंपनियों और प्राइवेट बीमा कंपनियों की क्या हिस्सेदारी है। बैंकर चाहते हैं कि हम पत्रकार किसानों को यह बात बता दें। वैसे बीमा का दावा भी नहीं मिलता, वे बैंक आते हैं मगर दावे का निपटारा तो कंपनी करती है और कंपनी ने बीमा तो बेचा नहीं, बैंक के अफसर ने बेचा। गाली बैंक का अफसर सुन रहा है। भारत के किसान इतने साक्षर हैं नहीं, और अगर पता भी चल गया तो उस बीमा को हटाने की लंबी प्रक्रिया से गुज़रते गुज़रते दस और काम आ जाते हैं।

हर दूसरे तीसरे दिन लॉगिन डे या महा लॉगिन डे लांच हो तो है, हर ब्रांच को टारगेट दिया जाता है और हर ब्रांच में अधिकारियों को टारगेट दिया जाता है। लॉगिन डे इसे इसलिए कहा जाता है कि जब तक आप उस टारगेट के हिसाब से किसानों और ग्राहकों की जेब से पैसा नहीं खींचेंगे तब तक आप लॉग आउट यानी कंप्यूटर बंद कर घर नहीं जा सकेंगे। अफसरों के कंप्यूटर पर एक सूचना फ्लैश करती रहती है कि आपका टारगेट 20 अटल पेंशन योजना और जीवन बीमा बेचने की है। बिना बेचे घर नहीं जा सकते। रात को जब ऊपर के कमांड से जब वो चेक हटाया जाता है तब जाकर बैंकर लॉग आउट करता है और ब्रांच बंद कर घर जाता है।

यह क्यों हुआ और इसे लोगों ने कैसे बर्दाश्त कर लिया ? नोटबंदी और उसके बाद की यह प्रक्रिया बताती है कि आप चाहें तो लाखो लोगों को नियमित रूप से लूट सकते हैं, लाखों लोगों को रूला सकते हैं और उन्हें हिन्दू मुस्लिम और फर्ज़ी राष्ट्रवाद के टापिक में उलझा कर रख भी सकते हैं। मैं समझता था कि आज के लोग ज़्यादा स्मार्ट हैं, बैंक सीरीज़ से एक बात समझ आ गई। लोग अब पहले से ज्यादा नादान हैं।

बैंकों में यह प्रक्रिया शुरू तो हुई यूपीए के समय से मगर 2014 के बाद से यह आक्रामक रूप ले चुकी है। टारगेट का दबाव अब यातना प्रताड़ना में बदल चुका है। बड़ी संख्या में स्त्री पुरुष बैंकर बीमार पड़ रहे हैं। लड़कियां शादी नहीं कर रही हैं और जिनकी शादी हुई है उन्हें पांच पांच साल तक साथ रहने का मौका नहीं मिलता है। दो अलग अलग राज्यों में ट्रांसफर का क्या मतलब है ? पांच से आठ महीने का गर्भ लेकर महिला बैंकर सौ डेढ़ सौ किमी की यात्रा कर बैंक जाती हैं। उनका पति 1500 किमी दूर पोस्टेड है। यह इसलिए किया जाता है ताकि बैंकर ख़ुद अपनी नज़र में गिर जाएं। अपनी आवाज़ खो दें। ग़ुलाम बन जाएं।

जब मैंने लिखना बोलना शुरू किया तो आज दो बैंक के बैंकरों ने बताया कि पांच साल में पहली बार उन्हें शनिवार और रविवार को न आने के लिए कहा गया है। एक बैंकर राजस्थान के थे और एक मध्यप्रदेश के। हमने महिलाओं को शौचालय के नाम पर धमकी देने की बात उठाई तो कई बैंकों ने बकायदा लिखित आदेश जारी किया है कि महिला शौचालय का निर्माण शुरू हो और साफ सफाई भी। बैंकर थोड़े खुश हैं। मुझे बधाई दे रहे हैं।

बैंकर काम करने से नहीं कतरा रहे मगर काम करने के दौरान जो ग़ुलामी थोपी गई है उससे घुटन हो रही है। सोचिए आप स्टेट बैंक आफ इंडिया के कर्मचारी हैं और बीमा बेच रहे हैं रिलायसं का, टाटा का या बजाज का। किस तर्क से यह सही है। जिसका जो सामान है वो अपना सामान बेचे।

बैंकरों का कहना है कि ग्राहक लेना नहीं चाहता, उसकी आर्थिक स्थिति भी नहीं है। हम उन्हें समझा ही सकते हैं मगर यह कैसे तय हो सकता है कि 20 पालिसी बेचे बिना आप घर नहीं जा सकते। कई बैंकों में लॉगिन डे और महालॉगिन डे पर बैंकर रात के नौ नौ बजे तक बैठे रहते हैं। बाहर से बैंक बंद दिखता है मगर अंदर कोई बैंकर बैठा रहता है। हम और आप लगातार इस ग़ुलामी को मंज़ूर करते जा रहे हैं।

मैं नहीं जानता कि यह बात कितनी सही है और कैसे साबित की जा सकती है मगर बैंकरों ने ही बताई है। शाखा से कहा जाता है कि आप डिपाजिट लेकर आइये। तो ये सरकारी अधिकारी के पास जाते हैं, कंपनी के पास जाते हैं। सरकारी अधिकारी अपना हिस्सा मांगता है। प्रति करोड़ डिपाज़िट पर दस से पंद्रह हज़ार रुपये रिश्वत के देने पड़ रहे हैं। एक बैंकर ने बताया कि आपस में मिलकर तीन चार लाख का लोन लिया और अब हर महीने उस रिश्वत पर 2000 से 3000 की किश्च चुकाते हैं। कई बार बैंक वाले भी इसमें हिस्सेदार होते हैं। यही नहीं बैंकों में एयर कंडीशन और स्टेशनरी की खरीद में ऊपर वाले खूब कमीशन खाते हैं। आप हम जब एसी लेंगे तो पांच सौ हज़ार की छूट दुकानदार दे ही देता है लेकिन बैंकों में सारा सामान एम आर पी पर ख़रीदा जाता है। थोक में ख़रीदने पर तो किसी को भी छूट मिलती है। इस लिए काला धन का निर्माण धड़ल्ले से जारी है।

अटल पेंशन योजना की तरह बड़ी संख्या में जनधन खाते निष्क्रिय पड़े हैं। हर शाखा में इनकी संख्या हज़ारों में हैं। प्रधानमंत्री के आंकड़ों में वह नंबर बदलता नहीं है। हम सब कई प्रकार के झूठ के साथ जीने के लिए बाध्य किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री भी यह सब सुनकर हंसते होंगे कि बात तो सही है लेकिन मैं तो चुनाव जीत रहा हूं। मेरा सवाल यही है आप जीत रहे हैं फिर जनता पर इतना सारा झूठ क्यों थोप रहे हैं।

बैंकरों से कहा जाता है कि आप उनमें एक एक रूपये डालकर सक्रिय करो। यह आसानी से चेक हो सकता है। अगर नागरिकों की टीम को आडिट करने दिया जाए तो तुरंत यह बात पकड़ में आ जाएगी। हम जान सकेंगे कि सरकार के फर्ज़ी दावों के लिए बैंकरों की जेब से कितने रूपए निकले हैं और कितने जनधन खाते ऐसे हैं जिनमें कभी न कभी एक रुपये या दस रुपये डाले गए हैं।

बैंकरों को सज़ा दी जाती है। उन्हें बुलाकर रीजनल मैनेजर के कमरे में खड़ा किया जाता है। एक बैंकर तो 9 घंटे खड़ा रहा, बेहोश हुआ तो सीधा अस्पताल में और ऊपर से उसे ट्रांसफर का नोटिस थमा दिया गया। टारगेट पूरा न होने पर 50 50 साल के बैंकरों पर चीखा चिल्लाया जाता है। राजकोट से एक महिला बैंकर फोन कर रोने लगीं कि भरी मीटिंग में अपमानित किया जाता है। बहुत सी बातचीत की ऑडियो रिकार्डिंग ख़ुद सुनी है मैंने। एक बातचीत में अफसर कह रहा है कि तू गधा है। है कि नहीं। अफसर कह रहा है कि हां सर मैं हूं। एक रिकार्डिंग में ऊपर वाला अफसर महिला मैनेजर को गाली दे रहा है। क्या हम अपनी नागरिकता भूल गए हैं ? क्या हम संविधान भूल गए हैं ? शायद भूल गए हैं। हम सबकी नागरिकता का बोध ध्वस्त हो चुका है। ध्वस्त न होता तो किसान सवाल करता, ग्राहक सवाल करता। बैंकर चुपचाप नहीं सहता – रवीश कुमार

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