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गरीबी के कारण पहले दादी, चाचा, दूसरे चाचा और फिर बड़े भाई ने की आत्महत्या लेकिन इस युवक ने नहीं मानी हार ..

ऐसे लोगो को हम अपना प्रेरणास्रोत बनाये न कि हिदू मुस्लिम करने वाले लफंदर नेताओ को बनाये।

आर्थिक तंगहाली और गरीबी के कारण पहले दादी, चाचा, दूसरे चाचा और फिर बड़े भाई ने की आत्महत्या लेकिन इस युवक ने नहीं मानी हार ..

माँ- बाप ने खेजड़ी के पत्ते और मींजल बेचकर अपना पेट पालते हुए बाड़मेर के उंडखा गाँव के गिरधर सिंह नामक इस युवक को पढाया . आर्थिक तंगहाली और गरीबी के कारण आज से कई साल पहले गिरधर की दादी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली . गरीबी ऐसी कि दादी की मौत के कुछ ही दिनों बाद उसके एक चाचा ने जहर खाकर और दूसरे चाचा ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। अकाल मौत और भूखमरी का ये सिलसिला यहीं नही रुका और ठीक 4 साल पहले दिपावली के दूसरे दिन गिरधर के बड़े भाई खुमानसिंह ने आत्महत्या कर ली। गरीबी और ऐसे हादसों से टूटे उन माता-पिता को गिरधर सिंह ने एक तोहफा दिया है और यह तोहफा है विपरीत हालात में पढ़कर एक अदद नौकरी हासिल करने का ।

 

कुछ लोगों के लिए गिरधर आज भी सामंत ही होगा लेकिन सच ऐसा है कि सुनकर रूह कांप उठे .ये कहानी उस व्यवस्था के गाल पर भी थप्पड़ है ,जो जाति और जन्म के आधार पर सम्पन्नता और विपन्नता तय करती है .दलितों -दमितों और पिछड़ों के साथ इस वर्ग के लिए भी तो सोचिये सरकार ! साथ ही ये पोस्ट उन युवा साथियों के लिये भी जो जिंदगी में कुछ कर गुजरने की तम्मना तो रखते हैं लेकिन वो मानते हैं कि उनके हालात ऐसे हैं कि वे आगे नहीं बढ़ पा रहे है और एक-दो असफलता के बाद अपने लक्ष्य को तिलांजली दे देते हैं। गिरधर को असफलता का सामना पहली बार तब हुआ था जब वह 9वीं कक्षा में फेल हुआ । उसके बाद तो ये सिलसिला लगातार चलता ही रहा।

 

पारिवारिक, सामाजिक, व्यापारिक हर क्षेत्र में असफलता पाई , लेकिन बात प्रतियोगिता परीक्षा की करें तो 21 परिक्षाओं में फेल हुआ । पुलिस, पटवारी, LDC, चपरासी, होमगार्ड, बैंक, गोला-बारूद, पंचायत सहायक आदि किसी में सिर्फ आधा-एक नंबर से पीछे रहा, तो किसी में मेरिट, हाईट, टाईपिंग आदि में बाहर निकल गया। हारा जरूर लेकिन मैदान छोड़कर नहीं भागा और आखिर में गिरधर अपनी 22वीं ग्रामसेवक परीक्षा में सफल हुआ ।

“हालांकि RAS-IAS बनने के ज़माने में ग्रामसेवक बहुत छोटा सा पद हैं, लेकिन मेरे वृद्ध माता-पिता के लिये ये IAS से भी बढ़कर हैं क्योंकि उन्होने अनपढ होते हुए भी , खेजड़ी के पत्ते और मींजल बेचकर अपना पेट पालते हुए मुझे पढाया। बुढापे में कमजोर होते शरीर और ऐसी घटनाओं के कारण माता-पिता अन्दर से टूट चुके थे।”गिरधर सिंह उंडखा, बाड़मेर बहरहाल गिरधर को ढेरों बधाई ! श्रीपाल शकतावत की रिपोर्ट

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