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नरेंद्र मोदी

अगर मोदी भारत एक खोज पढ़ लेते तो उन्हे बच्चों की किताबों से कंटेंट चोरी कर ‘एग्जाम वारियर्स ‘ लिखने की जरूरत नहीं पड़ती

दस साल से सत्ता की भूखी बैठी बीजेपी ने जब देखा कि जनता उसको महत्व नही दे रही है तब उसने अन्ना हजारे के आंदोलन को हाइजैक किया और कांग्रेस के खिलाफ झूठी कहानिया चुनाव की रैलियो मे सुनाना शुरू कर जनता को हर साल दो करोड रोजगार महंगाई पेट्रोल डीजल गैस सिलेंडर की कीमत एफडीआई पाकिस्तान से दस सिर काला धन 15 लाख रुपये सबके खाते मे जैसे जुमले सुनाये मूर्ख जनता मोदी के झांसे मे आ गयी और अपने साथ साथ देश ईएमएस पतन करवलिया।

अफ मोदी ने सोचा कि चार साल तो निकल गये इतने कार्यकाल मे  हिंदू मुस्लिम दंगे और दलितो की हत्या तीन तलाक मंदिर मस्जिद लव जिहाद 10 बच्चे पैदा घर वापसी गया माता बीफ तिरंगा यात्रा वंदेमातरम राष्ट्रवाद के नाम पर निकल गये अब एक साल के लिये नया कया किया जाय तो मोदी ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जवाहर लाल नेहरू पर बहुत सवाल उठाना शुरू कर दिया है।

आजकल मोदी नेहरू को कमजोर और अपने को सर्वशक्तिमान पीएम साबित करने पर तुले हुए हैं। देश के लिए इससे बड़ा शर्म का विषय क्या होगा कि आज़ादी के दौरान देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने वालों पर संघ के लोग जो तब अंग्रेजों की तरफ से लड़ रहे थे, सवाल उठा रहे हैं।

नेहरू जब 1944 में जेल में थे तब उन्होंने एक किताब लिखी थी ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया ‘ इसे क्लासिक का दर्जा हासिल है। मोदी को तो अंग्रेजी पढ़ने आता नहीं इसलिए उन्हें इसका हिंदी संस्करण ‘भारत एक खोज ‘ को पढ़ना चाहिए। अगर वे इसे पढ़ लेते तो बच्चों की किताबों से कंटेंट चोरी कर ‘एग्जाम वारियर्स ‘ लिखने की जरूरत नहीं पड़ती।

बहरहाल मैं उतना नहीं गिर सकता जितना मोदी गिर गया है, दरअसल मैं बताना चाहता हूँ देश के प्रधानसेवक वास्तव में हमारे प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ही थे। उनकी सादगी और दरियादिली के कई किस्से मशहूर हैं उन्हीं में से कुछ आपके लिए बीबीसी हिंदी के कोहिनूर रेहान फजल की कलम से ,लेख पुराना है पर बार – बार पढ़ने लायक है।

नेहरू को पैसे से कोई खास लगाव नहीं था. उनके सचिव रहे एम ओ मथाई अपनी किताब रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज में लिखते हैं कि 1946 के शुरू में उनकी जेब में हमेशा 200 रुपए होते थे, लेकिन जल्द ही यह पैसे ख़त्म हो जाते थे क्योंकि नेहरू यह रुपए पाकिस्तान से आए परेशान शरणार्थियों में बांट देते थे.ख़त्म हो जाने पर वह और पैसे मांगते थे. इस सबसे परेशान हो कर मथाई ने उनकी जेब में रुपए रखवाने ही बंद कर दिए।

लेकिन नेहरू की भलमनसाहत इस पर भी नहीं रुकी. वह लोगों को देने के लिए अपने सुरक्षा अधिकारी से पैसे उधार लेने लगे.मथाई ने एक दिन सभी सुरक्षा अधिकारियों का आगाह किया कि वह नेहरू को एक बार में दस रुपए से ज़्यादा उधार न दें

मथाई नेहरू की इस आदत से इतने आजिज़ आ गए कि उन्होंने बाद में प्रधानमंत्री सहायता कोष से कुछ पैसे निकलवा कर उनके निजी सचिव के पास रखवाना शुरू कर दिए ताकि नेहरू की पूरी तनख़्वाह लोगों को देने में ही न खर्च हो जाए.

जहाँ तक सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी का सवाल है जवाहरलाल नेहरू का कोई सानी नहीं था।

जाने-माने पत्रकार कुलदीप नय्यर ने एक ऐसी बात मुझे बताई जिसकी आज के युग में कल्पना नहीं की जा सकती. कुलदीप ने कुछ समय के लिए नेहरू के सूचना अधिकारी के तौर पर काम किया था

नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के शौक बहुत ख़र्चीले थे. एक बार वह शिमला के सर्किट हाउस में ठहरीं. वहाँ रहने का बिल 2500 रुपए आया। वह बिल का भुगतान किए बिना वहाँ से चली आईं. तब हिमाचल प्रदेश नहीं बना था और शिमला पंजाब का हिस्सा होता था. तब भीमसेन सच्चर पंजाब के मुख्यमंत्री होते थे।

उनके पास राज्यपाल चंदूलाल त्रिवेदी का पत्र आया कि 2500 रुपये की राशि को राज्य सरकार के विभिन्न खर्चों के तहत दिखला दिया जाए. सच्चर के गले यह बात नहीं उतरी

उन्होंने विजय लक्ष्मी पंडित से तो कुछ नहीं कहा लेकिन झिझकते हुए नेहरू को पत्र लिख डाला कि वही बताएं कि इस पैसे का हिसाब किस मद में डाला जाए. नेहरू ने तुरंत जवाब दिया कि इस बिल का भुगतान वह स्वयं करेंगे।

उन्होंने यह भी लिखा कि वह एक मुश्त इतने पैसे नहीं दे सकते इसलिए वह पंजाब सरकार को पांच किश्तों में यह राशि चुकाएंगे. नेहरू ने अपने निजी बैंक खाते से लगातार पांच महीनों तक पंजाब सरकार के पक्ष में पांच सौ रुपए के चेक काटे।

नेहरू सोलह शयन कक्षों के तीन मूर्ति भवन में रहते ज़रूर थे लेकिन वहाँ भी सादगी से रहने पर ही ज़ोर रहता था. उनके शयन कक्ष में एयरकंडीशनर नहीं था।

गर्मी के दिनों में जब वह दिन के भोजन के लिए तीन मूर्ति भवन आते थे तो मुख्य बैठक के सोफ़े पर बैठ कर आराम करते थे. वहाँ पर आगंतुकों के आराम के लिए एयरकंडीशनर लगा हुआ था. इसके बाद वह थोड़ी देर लेटने के लिए अपने शयन कक्ष में चले जाते थे।

उनके बड़े से शयन कक्ष में छत के पंखे के अलावा एक बहुत पुराना टेबल फ़ैन लगा हुआ था जो बहुत आवाज़ करता था. एक दिन इंदिरा गाँधी की सचिव उषा भगत ने नेहरू की देखभाल करने वाले शख़्स से कहा कि इस पंखे को तुरंत बदल दीजिए.पंखा बदल दिया गया.दूसरे दिन नेहरू का अर्दली दौड़ा हुआ उषा भगत के पास आया कि उन्होंने नया पंखा देखकर कोहराम मचा दिया है. अंतत: नेहरू पुराने शोर मचाने वाले पंखे को दोबारा लगवा कर ही माने।

1956 में नेहरू सऊदी अरब की राजकीय यात्रा पर गए. उन्हें रियाद में शाह सऊद के महल में ठहराया गया. उनके दल के सदस्य के हर बाथरूम में शैनल 5 परफ़्यूम की एक बड़ी बोतल रखी गई.नेहरू रात में कोई किताब पढ़ना चाहते थे, इसलिए उन्होंने पूछा कि क्या उनके कमरे में टेबिल लैंप लगाया जा सकता है ?

महल के लोगों ने समझा कि शायद कमरे में रोशनी पर्याप्त नहीं है. इसलिए अगले दिन नेहरू के कमरे में और तेज़ रोशनी वाला लैंप और बल्ब लगा दिया गया. उसकी चमक को कम करने के लिए नेहरू के साथ गए मोहम्मद यूनुस ने उसके चारों तरफ कपड़ा लपेट दिया।

रोशनी तो कम हो गई लेकिन उससे निकलने वाली गर्मी ने कपड़े को करीब करीब जला ही दिया. जब नेहरू वहां से वापस आने लगे तो शाह सऊद ने उनके लिए एक कैडलक कार और उनके दल के सदस्यों के लिए स्विस घड़ियाँ उपहार में भिजवाईं. नेहरू इससे थोड़ा असहज हो गए. वह नहीं चाहते थे कि वह विदेशी दौरे से कार उपहार में ले कर लौंटे।

मोहम्मद यूनुस उनकी परेशानी समझ गए. उन्होंने कहा, ‘इनके पास और क्या है? अगर मोटर न दें तो फिर क्या दें? तेल का पीपा या रेत का बोरा?’ नेहरू इस पर ज़ोर से हंसे. उन्होंने कार का तोहफ़ा स्वीकार कर लिया और शाह सऊद को अपना धन्यवाद भिजवाया.
शाह जानना चाहते थे कि नेहरू को कार के लिए कौन सा रंग पसंद है. वैसे उन्होंने पहले से ही उनके लिए हरे रंग की कैडलक पसंद कर रखी थी।

नेहरू ने कहा आपकी पसंद मेरी पसंद. भारत आते ही उन्होंने यह कार राष्ट्रपति भवन के वीआईपी कार बेड़े में शामिल करवा दी. 57 साल पहले भेंट दी गई यह कार आज भी राष्ट्रपति भवन के कार बेड़े में मौजूद है

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