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मोदी सरकार पेट्रोल डीजल और रसोई गैस के दाम तो रोज बढा सकती है, तो अनाज का मूल्य कयो नही बढा सकती?

अभी कुछ दिनो पहले मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों के विरोध में बीजेपी सांसद नाना पटोले ने इस्तीफा दे दिया था। पिछले साल नवम्बर को देश भर के लाखों किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली में एकत्र हुए थे।

जून में मन्दसौर में किसानों पर पुलिस फायरिंग के बाद देश के 190 किसान संगठनों ने 19 राज्यो में 10 हजार किमी की किसान यात्रा निकाली थी। 500 से अधिक जनसभाएं हुई तब जाकर सरकार कुछ चेती और फसल लागत से डेढ़ गुना दाम देने की बात उसे आम बजट में जोड़नी पड़ी।

सरकारी आंकड़ो के अनुसार देश के एक किसान परिवार की औसत मासिक आय लगभग 6 हजार 5 सौ रु प्रतिमाह है अर्थात सालाना 78 हजार रु मात्र। यदि 4 सदस्य प्रति परिवार भी मान लीजिए तो प्रति व्यक्ति 50 रु रोज के हिसाब से 6 हजार तो खाने पहनने में ही खर्च हो गया पढ़ाई,दवाई,खाद,बीज,डीजल के लिए बचा ही क्या ? खर्चा ज्यादा आमदनी कम है।

मौसम की मार और लागत के बाद तैयार हुई फसल का न्यूनतम मूल्य सरकार तय करती है। हमारे प्रधान जी कहते हैं कि सेना के जवान से अधिक जोखिम व्यपारी लेता है। पता नही कौन सा ऐसा व्यापारी है जो 10 रु लागत की वस्तु 4 रु में बेच देता है ?

अब जब सरकार ने बजट में फसल की लागत का डेढ़ गुना करने की बात जोड़ी है तो इसकी असलियत भी जान लीजिए। सरकार ने चालाकी से लागत की परिभाषा ही बदल दी है। जो समर्थन मूल्य पहले से घोषित किया गया था,उसी को डेढ़ गुना बता दिया गया है। उसी को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश लागू हो जाना बता दिया है।

आंकड़े गवाह हैं अभी वर्तमान फसल का मूल्य मार्किट में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम है। यानि सरकार का न्यूनतम समर्थन मूल्य काम नहीं कर रहा है। इसके कारण सिर्फ खरीफ में ही किसानों को 32 हजार करोड़ का घाटा हो चुका है। लेकिन सरकार ने इसके लिए बजट में मात्र 200 करोड़ रु ही आवंटित किए हैं ,जो एक जिले तक के लिए पर्याप्त नही है।

यह किसानों के साथ एक भद्दा मजाक है। सरकार के इरादे तो तभी जाहिर हो गए थे जब फरवरी 2015 में इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र देकर किसानों से किये वायदे पूरे करने से साफ इनकार कर दिया था।

किसानों द्वारा आलू, प्याज और टमाटर सड़को पर फेंक अपना विरोध दर्ज करवाना सरकार को नौटँकी लगती है। बाढ़, सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा में फसल नष्ट होने पर सरकार मुआवजा देती है, पर खेत का गेंहूँ आवारा मवेशी चरे जा रहे हैं। इसे किस आपदा में माना जायेगा ?

बिडम्बना है डीजल के दाम तो रोज बढ़ सकते है, लेकिन अनाज का मूल्य नही। जबकि डीजल के बढ़े दाम खेती की लागत को बढ़ा देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गन्ना आपूर्ति के 14 दिन के अंदर भुगतान देने को कहा था उसपर भी कुछ नही हुआ। आलू का कोई भाव ही नही है।

कुल मिलाकर खेती एक घाटे का सौदा है। इसी घाटे की वजह से किसान क़र्ज़ लेते है। अगली फसल में से पूरा करने की उम्मीद करते है। इसी चक्रव्यूह में उलझने से क़र्ज़ के दलदल में फसते चले जाते है और अक्सर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाते है।

कासगंज जैसी घटनाएं, पाकिस्तान भेजने वाले बयान इन्ही सब प्रमुख मुद्दों से भटकाने के लिए प्रयोजित किये जाते हैं। किसानों की समस्या पर कोई मीडिया चैनल डिबेट नही करता। चाय, पान, की दुकानों ,गली, नुक्कड़ ,चौराहों, रेल के डिब्बो में भी इस पर कोई चर्चा नही होती। जबकि किसान की खुशहाली और बदहाली दोनों का प्रभाव बाजार पर पड़ता है – सत्यार्थ

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