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संजय लीला भंसाली जी, औरतें चलती फिरती योनियां नहीं हैं – स्वरा भास्कर

फिलम एक्ट्रेस स्वरा भास्कर अपनी बोल्ड फिल्मों के लिए ही नही बल्कि अपनी बेबाकी के लिए भी जानी जाती है स्वरा भास्कर ने संजय लीला को एक खुला ख़त लिखा है । मूल ख़त काफ़ी लम्बा और अंग्रेजी में है, इसके कुछ ज़रूरी हिस्से अनुवाद कर रहा हूँ, बाकी का आपको नेट पे मिल जायेगा।

प्रिय भंसाली जी
सबसे पहले बधाई कि आप अपनी मशहूर फिल्म रिलीज कर सके। ‘आई’ कम पद्मावती, कम दीपिका पादुकोण की सुंदर कमर, कम आपकी फिल्म के 70 शॉट्स।

लेकिन सबके सिर अब भी कंधों पे हैं और नाक भी सलामत है। फिर भी आप film रिलीज करा सके, बधाई।

आज के ‘टॉलरेंट /सहिष्णु’ भारत में जहाँ लोग मीट के लिए मारे जा रहे हैं, मर्दाने गर्व की आदिम सोच का बदला लेने के लिए बच्चों पर हमले हो रहे हैं, आपका फिल्म रिलीज कर पाना वाकई सराहनीय है, बधाई।

और मैं आपको बताना चाहती हूँ कि मैं आपकी फिल्म जब ‘पद्मावती’ ही कहलाती थी, तब भी मैं उसके लिए लड़ी थी, हालांकि किसी युद्ध के मैदान में नहीं ट्विटर पर। मेरे पीछे मुस्लिम्स के पीछे पागल ट्रोल्स पड़े फिर भी मैं लड़ी। मैंने टीवी कैमरा पर वो बातें भी कहीं जो मुझे लगा 185 करोड़ फंसे होने के कारण आप नहीं बोल पाये होंगे।

जो मैंने कहा उस पर मेरा पक्का यकीन है कि आप या किसी और को भी बिना सेट पर आग लगे, बिना मार खाये, बिना हाथ पैर तुड़वाये और बिना ज़िन्दगी गंवाये, जितना वो ज़रूरी समझे हीरोइन का पेट दिखाते हुए, अपनी कहानी अपने ढंग से कहने का पूरा हक़ है। लोग सामान्यतः फिल्में बना सकें , रिलीज भी कर सकें और बच्चे भी सुरक्षित स्कूल जा सकें।

मैंने सच में चाहा कि आपकी फिल्म बड़ी हिट हो, बॉक्स ऑफिस के रिकार्ड्स तोड़ दे। शायद आपकी फिल्म से इसी लगाव के चलते, उसे देखने के बाद मैं अवाक हो गयी हूँ, और ये कहना पड़ रहा है सर ! कि रेप होने के बाद भी औरत को जीने का हक़ होता है।

औरत को उसके पति, उसके रक्षक, उसके मालिक, उसकी सेक्सुअलिटी के कंट्रोलर जो कुछ भी आप मर्द को कहें, के बगैर जीने का हक़ है।

मर्द के ज़िन्दा होने न होने से औरत को जीने का हक़ है।

ये बेसिक बातें हैं, इन्हीं में थोड़ी और भी हैं।

औरतें चलती फिरती वैजाइना नहीं हैं।

हाँ उनके पास वैजाइना है, पर वे उससे ज़्यादा भी कुछ हैं। इसलिए उनकी पूरी ज़िन्दगी वैजाइना और वैजाइना को कंट्रोल करने, उसकी रक्षा करने, उसकी शुद्धता बचाने पे फोकस करने की ज़रूरत नहीं है। (13 वीं शताब्दी में ऐसा था भी तो 21वीं सदी में हमें इन टुच्चे विचारों का महिमामंडन करने की ज़रूरत नहीं है।

बेहतर होता कि योनियों को सम्मान दिया जाता। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा है नहीं। एक औरत किसी के द्वारा अपनी मर्ज़ी के बिल योनि के असम्मान के बावज़ूद जी सकती है।

क्योंकि योनि के बाहर भी ज़िन्दगी है, इसलिए रेप के बाद भी ज़िन्दगी हो सकती है।

और सामान्यतः ज़िन्दगी योनि से ज़्यादा कुछ है।

आप सोच रहे होंगे कि मैं ये योनि के बारे में में ही क्यों बोलती जा रही हूँ ? क्योंकि सर ! आपकी मशहूर फिल्म देख के मैंने यही महसूस किया। मैंने योनि ही महसूस की। मुझे महसूस किया कि मुझे महज़ वैजाइना तक सीमित कर दिया गया है।

मैंने महसूस किया कि जैसे वोट का अधिकार, सम्पत्ति का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, समान काम के लिए समान वेतन, मातृत्व अवकाश, विशाखा जजमेंट, बच्चा गोद लेने का हक़ जो भी छोटा मोटा महिलाओं के आंदोलन ने हासिल किया है, वो सब बेकार है, क्योंकि हम लौट तो वापस बेसिक्स (रूढ़ पहचानों) पर रहे हैं।

सती और जौहर महिमामंडन के लायक प्रथाएं नहीं हैं। आपकी फिल्म  रिलीज के एक हफ़्ते पहले जींद हरियाणा में के 15 साल की दलित लड़की का ब्रूटल गैंग रेप हुआ है।

आप जानते ही होंगे कि सती और रेप दोनों एक ही माइंडसेट का नतीज़ा हैं। एक रेपिस्ट स्त्री के जननांग पर अटैक करता है, अतिक्रमण करता है, जबरन प्रवेश करता है, उसपर नियंत्रण पाने के लिए उसे विकृत करता है, उस पर हावी होगा या उसे नष्ट कर देगा।
सती और जौहर के पक्षपोषक और समर्थक भी औरत के जननांगों का अतिक्रमण हो जाये या वे किसी ‘अधिकृत मर्द’ के नियंत्रण में न रहें, तो उस का उन्मूलन ही करते हैं।

दोनों ही मामलों में मसला औरत को महज यौन अंगों तक सीमित करने का है।

आप कहेंगे कि आपने फिल्म से पहले 2 लाइन का डिस्क्लेमर दिखाया था फिल्म सती / जौहर का सपोर्ट नहीं करती। लेकिन सर उसके बाद आपने ढ़ाई घण्टे अपनी फिल्म में दिखाया क्या ?

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