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मोदी दाओस

इस आदमी ने देश को ऐसी बुरी नजर लगा दी कि आज हम अपना सब कुछ गँवा कर विदेशियों से भीख मांग रहे है

जाने किसकी बुरी नजर लगी कि आज हम अपना सब कुछ गँवा कर दूसरों के आगे हाथ पसारे खड़े हैं । विदेशी व्यापारियों से कह रहे हैं कि आओ हमारे देश में तुम्हारा स्वागत है । हम तुमको निराश नहीं करेंगे । अभी भी इन तिलों में काफ़ी तेल बाकी हैह

दावोस में प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का भाषण सुनकर अपने ऊपर बड़े गर्व की अनुभूति हुई ।अभी तक तो हम मोदी जी के भाषण जब भी सुनते थे, उसमें एक सुनहरे भविष्य का आश्वासन पाते थे ।पहली बार हमको पता चला कि हम एक सुनहरे वर्तमान में जी रहे हैं ।हमारा देश गाँधी जी के बताये रास्ते पर चल रहा है ।हम लोकतांत्रिक मूल्यों का आदर करते हैं । साम्प्रदायिक समन्वय, आपसी सद्भावना और सहिष्णुता हमारे जीवन का आदर्श है।

सारे देश ने खुशी- खुशी आर्थिक सुधार के लिये उठाए गये हमारे कठोर कदमों का स्वागत किया है। उसी के परिणाम स्वरूप अब गरीबी और बेरोजगारी कोई समस्या नहीं रह गयी है ।ऐसा इसलिये है कि हम – सर्वे भवन्तु सुखिनः और सर्वे सन्तु निरामयः के रास्ते पर चल रहे हैं ।

हम सबका साथ लेकर सबका विकास करते- करते विश्व की ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण कर चुके हैं जिसका लोहा सभी मानते हैं ।गाँधी जी कहते थे कि हमारा अादर्श यह होना चाहिये कि हम उदारता पूर्वक सभी देशों की संस्कृतियों को अपने आंगन में बसा सकें ।

उसी के अनुसार हम सभी देशों के निवेशकों को दावत दे रहे हैं कि वह हमारे देश में निवेश करें । हमने 100% विदेशी निवेश के लिये नोटबंदी, डिजिटल प्रणाली , जी एस टी, ई गवर्नेन्स आदि की रेड कार्पेट बिछा दी है ।आप समृद्धि के साथ सेहत व शान्ति के लिये भारत आयें । उन्होंने यह प्रलोभन भी दिया कि हमारा देश एक बहुत बड़े उपभोक्ता के रूप में अापका इन्तज़ार कर रहा है ।हमारे यहाँ प्रति 1000व्यक्तियों पर वाहनों की संख्या मात्र 25 है, जबकि यूरोपीय देशों में यह लगभग 500 है । हमारे यहाँ प्रति व्यक्ति स्टील का उपभोग मात्र 60 किलोग्राम है जबकि विश्व का औसत 218 किलोग्राम है , वगैरह वगैरह ।

अब यहाँ सवाल यह उठता है कि विश्व के दिग्गज निवेशक क्या इतने भोले हैं कि ऐसे प्रलोभनों भरोसा कर लेंगे ? क्या वह यहाँ ऐसे उद्योग लगाने आ पहुँचेंगे जिनको हम स्वयं नहीं लगा सकते ? इतना ही नहीं हम अपनी इस मजबूरी का डंका भी पीट रहे हैं ? हम एक साधारण फ़्रिज या वाशिंग मशीन खरीदने से पहले दस तरह की पड़ताल करते हैं ।

क्या ये भारत के वोटर की तरह बिना पड़ताल के ही यहाँ अरबों रुपयों का निवेश कर डालेंगे ? क्या इनके लिये यहाँ का एक भी अखबार पढ़ना कठिन है ? क्या ये यहाँ के अशान्त हालात से अनभिज्ञ हैं ?

क्या इनसे यह जानकारी छिपाई जा सकती है कि भारत की 73% पूँजी केवल 1% लोगों की मुट्ठी में कैद है ? तो यदि उन्होंने प्रति हजार लोगों के लिये पाँच सौ वाहनों का निर्माण कर भी दिया तो उस 1% उपभोक्ता को कितने वाहन बेच पायेंगे ? क्या उनको पता नहीं कि हम रेलवे और एयर लाइंस जैसे सरकारी संस्थानों तक को बेचने के लिये मजबूर हो चुके हैं ? क्या उनसे यह सच छिपाया जा सकता है कि हम कंगाली के कगार पर आ पहुँचे हैं और अब 50 हजार करोड़ का कर्ज़ पाने के लिये हाथ पसार रहे हैं ?

विदेशी निवेशकों को झाँसा नहीं दिया जा सकता है ।ज्यादा सावधानी इस बात की रखनी है कि वे हमको झाँसा न दे सकें ।इतना तो तय है कि वह हमारी असलियत को जान समझ कर भी यहाँ पूँजी निवेश करेंगे । हमारा उद्धार करने के लिये नहीं बल्कि अपनी तिजोरी भरने के लिये । मरते हुए जानवर की टोह मीलों दूर बैठे हुए गिद्धों को मिल जाती है ।

हमें हमारा इतिहास बहुत कुछ सिखा जाता है । हमारे देश में पहले भी ऐसा हो चुका है ।औरंगजेब के शासन काल में यह देश इतना संपन्न था कि उसकी गणना विश्व के चार अति समृद्ध देशों में होती थी । उसकी मृत्यु के बाद मुगल सल्तनत एक के बाद एक अयोग्य शासकों के हाथ में आती चली गयी जिन्होंने सारी दौलत भोग विलास और मूर्खतापूर्ण खर्चों में बरबाद कर डाली ।तब भी विश्व के धनवान गिद्धों ने मंडराना शुरू कर दिया था । पुर्तगाली आये , फ़्रांसीसी आये और सबसे ताकतवर देश इंगलैंड आया और इस देश को चुटकियों में अपना उपनिवेश बना लिया ।

जर्मनी और जापान भी लार टपका रहे थे पर शेर के शिकार पर गीदड़ कब्जा नहीं कर सके । जो भी यहाँ आया वह इस देश की आर्थिक और प्राकृतिक संपदा का दोहन करने के लिये आया ।अंग्रेज जब यहाँ से गये तो इन तिलों में से तेल की आखिरी बूँद तक निचोड़ चुके थे । जो बचा वह अकाल और महामारियों से त्रस्त एक नंगा भूखा देश था ।

हम उस तूफ़ान से अपने देश की कश्ती को बड़ी- बड़ी मुश्किलों से निकाल कर ले आये थे । हम सुखी थे , समृद्ध थे , सुपर पावर देश हमारा आदर करने लगे थे । तभी हमसे एक भूल हुई कि हमने मंगल यान बना कर विश्व में खलबली मचा दी ।

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