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मेरी योनि से निकला खून तुम्हारे धर्म के रीति रिवाज़ों को धोने के लिए नहीं है – मोनिका जौहरी

अमादरणीय नारीवादी माताओं, पितृसत्तात्मक बुजुर्गों,और सभ्य स्वच्छ समाज के ठेकेदारों,

मेरी योनि से खून तुम्हारे धर्म के रीति रिवाज़ों को धोने के लिए नहीं निकलता

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि एक तरफ लोग चाँद पर घर बसाने की तैयारी कर रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ आधी आबादी अभी भी हर कदम पर संघर्ष कर रही है..शिक्षा की कमी और अज्ञानता के कारण माहवारी जैसी प्राकृतिक बातें भी बहुत सारी लड़कियों और महिलाओं के लिए एक ऐसी समस्या है जिनसे निजात पाना आसान नहीं है..रिपोर्ट से पता चलता है कि लड़कियों के स्कूल छोड़ने का एक प्रमुख कारण ये भी है..लड़कियों को न तो घरों में सकारत्मक तरीके से माहवारी और हाइजीन के बारे में बताया जाता है न ही स्कूलों में इसको लेकर उचित इंतेज़ाम होते हैं !

कुछ ऐसा ही हाल गाँव में रहने वाली महिलाओं का भी है महिलाएँ घर की चारदीवारी तक सीमित रहती हैं और घर के पुरुष सदस्य इसे औरतों की समस्या समझ चुप्पी साधे रहते हैं आज भी बहुत सारी महिलाएं माहवारी के समय राख, मिट्टी, गंदा कपड़ा, फटी पुरानी ब्रा, घास, गोबर के साथ-साथ पत्ते तक का इस्तेमाल करती है जिसकी वजह उन्हें यूरिनरी इन्फेक्शन से लेकर कई बार ब्रा में लगे लोहे के हुक से गम्भीर इंजरी भी हो जाती है…

जहाँ अचानक एक 13 साल की लड़की शरीर की एक ऐसी जैविक प्रक्रिया से गुज़र रही होती है, जिसके बारे में उसे कुछ पता नहीं होता। एक ऐसी प्रक्रिया जिस पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है, जिसे उसने नहीं चुना है, जिसके बारे में वह पूरी तरह से अंजान है और वह यही सब जानने की कोशिश करती है इतने में एक दिन एंट्री होती हैं #समाज की !!

जिस समाज में दुकानदार सैनिटरी नैपकिन को अखबार के पन्नों में लपेटकर, काली पॉलिथिन में बांधकर देते हैं। जहां माएं बेटियों को सख्त हिदायत देती हैं कि उनके पीरियड्स के बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए, पापा, भैया को तो बिल्कुल नहीं।

जहां महीने के हर पांच दिन हर औरत अशुद्ध करार देकर तीज-त्यौहार, पूजा-पाठ, मंदिर-अनुष्ठान से दूर कर दी जाती है। अचार न छूने देना, रसोई में न जाने देना, स्कूल जाने से रोकना, खेलने से रोकना, उसे रसोई में नहीं आने दिया जाता है, खाने के बर्तन अलग कर दिए जाते हैं घर में रखी अलमारी को उस दौरान नहीं छुआ जा सकता, कहीं-कहीं तो उसे सोने के लिए अलग कमरा दिया जाता है। क्योंकि हमारे देश में पीरियड्स वाली महिला अछूत होती है।

समाज मोबाइल में रिंगटोन रखता हैं “अम्बे..तू हैं जगदम्बे काली…जय दुर्गे खप्पर वाली” .. कन्या पूजन में बिटिया के पैर छूता हैं.. समाज ने अपने गले में लक्ष्मी का लॉकेट डाला हुआ हैं और निर्भया के लिए मोमबत्ती भी जलाता हैं.. समाज अपना दिव्य और सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी जमा किया अमूल्य ज्ञान उस कन्या पर उढेल देता हैं …पवित्रता की उच्च आदिम और उम्दा कुंठित सोच से बुरी तरह चिपका हुआ समाज उसे इसी प्रक्रिया के नाम पर अपवित्र करार दे देता है ।

और अगले दिन ही नवरात्रा की “अष्टमी को नौ कन्या को भोज कराया जाता है ”उन दिनों” में गन्दी, दूषित और अपवित्र महिला पीरियड्स खत्म होते ही फिर से साफ-सुथरी, देवी बन जाती है। और समाज वाले पूछते है कि आपकी बेटी माहवारी से तो नहीं होती ??

यदि माहवारी शुरू हो जाए तो कन्या भोज नहीं करा सकते ??

यदि नही तो आप लोग फिर देवी से मन्नत क्यों नही मांग लेते की आपकी बेटी की कभी महावारी ही नहीं आये !!

पीरियड्स को टैबू माना जाता रहा है। टैबू मतलब ये कि इस पर माँ अपनी बेटी से भी ठीक से बात नहीं करती। इसी बात पर कैम्पेन चलते है कि इस पर बात होनी ज़रूरी है। ये कैम्पेन सैनिटरी नैपकिन बनाने वाले अरबों के कारोबार करने वाली संस्थाओं से लेकर ग़ैरसरकारी संस्थाओं तथा कई महिलाएं चलाने की कोशिश करती है ! और कई जगह उनके प्रयासों के लिए सरकार और मीडिया की तरफ से वाहवाही के साथ सम्मानित भी किया जाता है। पर उनके काम का नाम ( यानी कि मासिकधर्म ) तक नहीं लिया जाता है।

सशक्तिकरण के झूठे फंदे में झूल रही लड़कीयाँ और महिलाएं व्यवस्थाओं को गौर से देखती है और अपने धर्म, समाज और व्यवस्थाओं के पीछे छिपे शोषण को देखती है। फेसबुक, व्हाट्सएप, यूट्यूब और लल्लनटॉप तक सबको बारी बारी से अपने जहन में उतार लाती है। और उनके परिणाम समेत दुष्परिणाम दोनों को आंकती है। एक बार यह भी सोचती है कि जो मां माहवारी को छिपाने के लिए बचपन से इतनी कहानियां बनाती आई है। गंदा खून बताती आई है। वो खून जो हर महीने उसे निचोड़ देता है, तोड़ देता है। ब्रा को हमेशा तौलिये के नीचे टांगने की नसीहत देती आई है, पैंटी को कपड़ों के बीच में दबाने छिपाने के तरीके समझाती आई है। आखिर वो कैसे इस बात को स्वीकार कर सकती है। ये तमाम सवाल अपाहिज व्यवस्थाओं को और लाचार बना देते हैं। जब जब ये व्यवस्थाएं मजबूत होने की कोशिश करतीं तो इन्हें धर्म-शरम के चलते एक दफे फिर से तोड़ दिया जाता है।

फिर एक हिस्सा हमारे समाज का वो आया जिसके पास हर तरह की सुविधा है लेकिन वो अपनी पहचान तलाशने में व्यस्त है। आईडेंटिटी क्राइसिस से ग्रस्त लोग। ये तबक़ा तुरंत ही कुछ करके कुछ पा जाना चाहता है। इसे प्रसिद्ध होने की भूख है। ये प्रतीकों को अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हुए नेता या नेत्री बनने की चाह में होते हैं। ऐसे लोग ज़मीनी हक़ीक़त से बहुत दूर, फेसबुक आदि पर ही कैम्पेन का विरोध करते हैं और उनके लिए वो रास्ता सबसे सही होता है जो सबसे छोटा होता है। ये लोग ज़मीन पर कुछ काम कर रहे थे और अचानक इस कैम्पेन का विरोध ऐसे लोग करने लगे जो नारीवाद की बात कर रहे थे। जबकि नारीवाद बहुत ही व्यापक क्षेत्र हैं, जिसका एक आयाम स्त्री-स्वास्थ्य है क्योंकि उनको मर्दों की अपेक्षा स्वास्थ्य सुविधाएँ भी नहीं मिलतीं, या वो खुद ही समाजिक कंडिशनिंग के कारण छुपाती हैं। जैसे कि मेरी माँ का दर्द जब चरम पर नहीं पहुँचेगा वो नहीं बताएगी कि कुछ हुआ है। जब तक डॉक्टर के पास पहुँचेंगे, पता चलेगा कि अब बचने की नौबत नहीं है।

इस तरह के लोग कैम्पेन की पवित्रता और लक्ष्य को हाइजैक करके इतना नीचे ले आते हैं कि आम जनता को ये लगने लगता है कि यही मुख्य उद्देश्य है जैसे कि पीरियड्स के धब्बों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालना चाहे वो आपके पजामें पर हो, चादर पर हो, या कुर्सी के गद्दों पर, मुझे ये समझ में नहीं आता कि धब्बों को शेयर करने से किस प्रकार की आपत्ति फैल रही है ? क्या इसके बाद बहुत सारी लड़कियाँ ऐसा करने लगेंगी ? अगर हाँ तो उससे आपके धार्मिक समाज के क्षेत्र में किस तरह का बदलाव आ जाएगा ?

इन लोगो मे इसपर बात करना एक डिसगस्ट का भाव लाता है। मुझे आपत्ति इस बात से है कि नारीवाद का दायरा, इसका दर्शन, संकुचित और संकीर्ण होकर अब पीरियड्स के धब्बे तक पहुँच गया है। आपको नारीवादी बनने के लिए, नारियों की स्थिति पर बात करने की, जागरूक करने हेतु बातें लिखने की ज़रूरत नहीं। आप सिर्फ वो धब्बा दिखा दें, आपको जनता मान लेगी कि हाँ ये युग प्रवर्तक नारीवादी हैं।

नारीवाद को, महिलाओं की समानता को पीरियड्स के धब्बे तक मत गिराइए। इससे नुक़सान आपका कुछ नहीं क्योंकि आप तो बेहतर परिवार से हैं, नौकरीशुदा हैं, आपके पास एक आवाज़ है, हॉस्पिटल है। इससे आप उन सबका नुक़सान कर रही हैं जो नारीवाद के सच्चे रूप को लेकर प्रयासरत हैं। और हाँ, नारीवादी होने के लिए, पीरियड्स पर बात करने के लिए मुझे एक स्त्री होने की ज़रूरत नहीं है। अगर मैं एक मानव के तौर पर कुछ सोच पा रही हूँ, जहाँ मेरे लिए स्त्री, पुरुष और तमाम बाकी सेक्सुअल और जेंडर आइडेंटिटीज़ एक हैं, मुझे इस तरह के विकृत प्रश्न का जवाब देने की ज़रूरत नहीं कि

‘डू यू हैव यूटेरस ?

अपने आस पास नज़र घुमाओ तो तुम्हे पता भी नहीं चलेगा की कितनी लड़किया पीरियड्स होते हुए भी सड़को पर हैं..तुम्हारे साथ और तुम्हे पता चलने भी नहीं देगी क्योंकि उसे पता हैं की तुम्हे पता चलते ही तुम क्या करनेवाले हो, तुम कहने क्या वाले ओ…तुम समाज हो…तुम रिंगटोन नहीं बदलोगे ! हमने तो रिसर्च करके जान लिया कि “हम कैद में तो हैं लेकिन कमज़ोर नहीं हैं।” पर उनका क्या जो वर्तमान में भी हमारे भूतकाल से गुज़र रहे हैं ?

और कुछ ऐसा ही पढ़ देख कर हमको ये समाज चरित्रहीन घोषित कर देता है क्योंकि वो सारी लड़कियाँ क्या चरित्रहीन होती हैं जो :-

– शॉर्ट्स में घूमतीं हैं

– जिनके ब्रा का स्ट्रेप दिखता है

– जो मंगलसूत्र टाँग कर नहीं घूमतीं

– जिनके पैरों में बिछुय्ये नहीं होते

– जो शादी के बाद भी पुरुषों से बात करती है

-जिनके पुरुष मित्र शादी के बाद बनते है

– जो सिंदूर नहीं लगाती

– जो पति का फ़ोटो कलेजा से सटाये नहीं घूमतीं

– जो समाज के बनाए नियमों को तोड़ कुछ अलग करना चाहतीं हैं वो सबकी सब चरित्रहीन होती है ! तो

– मुझे चरित्रहीन लड़कियाँ पसंद हैं क्यूँकि वो ज़िंदा हैं,

– सिर्फ़ साँस लेती चलती फिरती कठपुतलियाँ नहीं हैं।

चरित्रहीनता से अगर तुम्हारा अस्तित्व है तो हमे चरित्रहीन होने में कोई आपत्ति नहीं है। क्योंकि हमारे धब्बो से ही तुम लोग का अस्तित्व पैदा हुआ है ! बाक़ी तो सीता को भी एक गँवार धोबी जज करता है और उसका पति छोड़ देता है उसे और वही पति भगवान है ! ख़ैर. मेरी योनि से खून तुम्हारे धर्म के रीति रिवाज़ों को धोने के लिए नहीं है- मोनिका जौहरी

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