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पूरे भारत मे घूमफिर कर देख लीजिये, देश की सबसे बड़ी समस्या ‘ सेक्स ‘ है।

देश में सबसे ज्यादा विज्ञापन किस चीज के होते हैं ? पूरा देश घूम लीजिए, ये विज्ञापन आपको हर कहीं मिल जाएंगे। हर भाषा में, हर जगह पर। आपको दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डालना पड़ेगा, आप समझ चुके होंगे। जी हां, मर्दानगी के विज्ञापन हमारे देश में सबसे ज्यादा पाए जाने वाले इश्तहार हैं। दीवारों, नुक्कड़ों, चैराहों, खम्भों सब जगह आपको ये दिखेंगे। न जाने कितने अनजाने अस्पताल, डाक्टर, शफाखाने बिना किसी डिग्री या डिप्लोमा के लोगों में मर्दानगी को चूरन की गोली तरह बांट रहे हैं। कोई विदेशी आकर इन्हें देखें और समझे तो उसे लगेगा नपुंसकता हमारे देश की राष्ट्रीय महामारी है !

इन विज्ञापनों के पीछे हमारे पुरुषवादी सोच की जहरीली जड़ें साफ-साफ देखी जा सकती हैं। पुरुष की मर्दानगी को इतनी महत्वपूर्ण चीज बनाना और स्त्री को उसके इस्तेमाल की चीज बनाना, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। मानो पुरुष के जीवन का उद्देश्य बस स्त्री को भोगना ही है। ऐसी किसी भी विज्ञापन में स्त्री की दृष्टि से कुछ नहीं लिखा होता है। हर बात पुरुष के आनन्द और संतुष्टि से चालू होती है और उसी पर खत्म हो जाती है। पुरुष सेक्सुअलिटी को स्त्री सेक्सुअलिटी से इतना अधिक महत्व देना एक मेल शॉविनिस्टिक सोसायटी का सबसे खतरनाक लक्षण है।

इस तथाकथित ‘मर्दानगी’ के प्रचार का नतीजा है कि एक औसत पुरुष हर समय अपनी ‘मर्दानगी’ साबित करने में लगा रहता है और इसे साबित करने का सबसे आसान तरीका उसे यही लगता है कि महिलाओं को नीचा दिखाया जाए, उन्हें बस एक उत्पाद बना दिया, एक इस्तेमाल की चीज।

कभी धर्म का मुखौटा लगाकर महिलाओं को नरक का द्वार बताया जाए तो कभी स्वयंभू समाज शास्त्री बन कर साबित किया जाए कि महिलाओं का स्वतन्त्र होना समाज के लिए हानिकारक है। जब ये सब करके भी चैन नहीं मिले तो बलात्कार पर उतारू हो जाना। और फिर यह साबित करना कि दरअसल महिलाओं के कपड़े बलात्कार की घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं !

यह वैसे ही है जैसे यह कहना कि आत्महत्या के लिए सीलिंग फैन जिम्मेदार हैं, न सीलिंग फैन होंगे न लोग उनसे लटक कर आत्महत्या करेंगे।

हमारे भीतर बड़े ही सूक्ष्म रूप में स्त्री को सिर्फ एक देह में बदल कर फिर उस देह को अपनी इच्छा और जरूरत के हिसाब के ढकने और खोलने का घिनौना खेल चलता रहता है।

पुरुषवादी सोच की घुट्टी पी-पी कर बड़ी हुई महिलाएं बेहोशी में खुद भी इसमें शामिल हो जाती हैं और आने वाली पीढ़ी को भी इसी गंदी नाली में घसीटने के काम में शामिल हो जाती हैं।

बचपन से ही एक लड़की को समझाया जाता है कि उसका शरीर ही महत्वपूर्ण है, उसकी समझ, उसका ज्ञान दो कौड़ी का है, जो भी है बस यही शरीर है।

वास्तव में वो एक ही पुरुष है जो अपने घर की औरतों को सात पर्दों में छुपा कर और बाहर की औरत को सरेआम नंगा करके अपनी बीमार मर्दानगी को संतोष पहुंचाते हैं।

लेकिन इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि घर में औरतें सुरक्षित हैं, कई सर्वेक्षण इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि 60 से 70 प्रतिशत महिलाओं को किसी-न-किसी प्रकार की यौन प्रताड़ना का शिकार बनना पड़ता है। इनमें से लगभग लड़कियों ने स्वीकार किया कि उनके साथ यौन दुर्व्यवहार किया गया और करने वाले कोई अजनबी नहीं बल्कि उनके परिवार के सदस्य, पड़ोसी या स्कूल में पढ़ाने वाले अध्यापक थे। कुछ लड़कियों ने किसी भी प्रकार की जानकारी देने से मना कर दिया। इन आंकड़ों से हम स्थिति की भयावहता को समझ सकते हैं।

पुरुषवादी सत्ता के पक्षधर ये भूल जाते हैं कि दूसरे को गुलाम बनाने वाला पहले खुद मानसिक गुलाम बन चुका होता है। यह आक्रामक, अमानवीय, भावनाशून्य मर्दानगी स्त्रियों के लिए तो घातक है ही, लेकिन वो पुरुषों को भी चैन से नहीं बैठने देती और वो अपने तंग दायरे में ही अपना दम घोंटता हुआ जिंदगी काट देता है।

सोचने की बात यह है कि जिस देश में मर्दानगी बस बिस्तर पर उछल-कूद मचाने या कमजोर को सताने तक सीमित हो जाए और जनानी सिर्फ बच्चे जनने और मर्दों की जरूरतें पूरी करने के लिए अभिशप्त कर दी जाए वह देश शायद तुक्के से दुनिया के नक्शे पर तो बना रह जाएगा लेकिन न्याय, समानता, शांति और सच्चा विकास उसे कभी नसीब नहीं होंगे – मोनिका जौहरी

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